बिलासपुर की एक लड़की सिर्फ एक रुपये से चला रही है मदद का अनोखा अभियान

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले की सीमा वर्मा सिर्फ एक-एक रुपये इकट्ठा कर मदद की अनोखी मुहिम चला रही है। एलएलबी पांचवें सेमेस्टर की छात्रा सीमा इस मुहिम के जरिए 33 विद्यार्थियों की फीस भरने का जिम्मा उठा रखा है। साथ ही इस मुहिम के जरिए वे अब तक 11 हजार से ज्यादा बच्चों को स्टेशनरी का सामान भी मुहैया करा चुकी हैं। सीमा ने ये साबित कर दिया है कि सेवा के लिए पैसा या संसाधन कोई बाधा नहीं है। जरूरत बस सेवाभाव की है। इंसान स्वभाव से मददगार होता है। जरूरत इस भाव को जगाने की है। ‘एक रुपया’ मुहिम मदद का भाव जगाने के लिए है।

समाज की सहायता से मदद के मुहिम की शुरुआत सीमा वर्मा ने ग्रेजुएशन के दिनों से ही कर दिया था। पढ़ाई के दौरान उनकी एक सहेली दिव्यांग थी। सीमा उसे बैटरी वाली ट्राय साइकिल दिलाना चाहती थी। हालांकि उन्हें ये बिल्कुल पता नहीं था कि ये कैसे मिलेगा। जानकारी के लिए कॉलेज के प्रिंसिपल से बात की। प्रिंसिपल ने व्यस्तता का हवाला देते हुए एक हफ्ते बाद बात करने को कहा। सीमा थोड़ी निराश हुई लेकिन उसी पल ठान लिया कि किसी भी कीमत पर दोस्त को ट्राय साइकिल दिलाकर रहेंगी।

वे बिलासपुर शहर की साइकिल की दुकानों पर जानकारी लेने पहुंच गईं। लेकिन ना तो ट्राय साइकिल और ना ही उसके बारे में कोई जानकारी मिली। इस बीच सीमा ने एक दुकान के सामने बैठे पंचर मिस्त्री से और साइकिल की दुकानों की जानकारी मांगी। पंचर मिस्त्री को जब पता चला कि सीमा अपनी दिव्यांग दोस्त के लिए बैटरी से चलने वाली ट्राय साइकिल की जानकारी इकट्ठा करने निकली हैं तो उसने मजाकिया लहजे में पूछा, “कौन सी क्लास में हो।” सीमा ने बताया, “ग्रेजुएशन लास्ट ईयर।” पंचर मिस्त्री ने बोला, “आपको पता नहीं गर्वनमेंट दिव्यागों को ट्राय साइकिल निशुल्क बांटती है।” सीमा हैरान हुई कि ग्रेजुएशन की छात्रा होने के बावजूद उन्हें ये जानकारी नहीं थी।

पहली बार सीमा को पंचर मिस्त्री से जानकारी मिली कि जिला पुनर्वासन केद्र पर सारे दस्तावेज जमा करने के बाद ट्राय साइकिल मिलता है। कई बार इसमें 8-10 महीने भी लग जाते हैं। उसी पंचर मिस्त्री ने सीमा को आसान रास्ता भी बताया कि अगर वे कमिश्नर से मिलें तो शायद जल्दी हो जाए। सीमा उसी दिन कमिश्नर के पास पहुंच गईं। कमिश्नर से मिलकर उन्हें पूरी बात बताई। सीमा के जज्बे से कमिश्नर बहुत प्रभावित हुए। नतीजा, उनकी दोस्त को अगले ही दिन ट्राय साइकिल मिल गई।

सीमा बताती हैं कि उस दिन उन्हें तीन बातों की गांठ बांध ली। पहला- कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। दूसरा- लोगों की मदद उनको सही रास्ता दिखा कर भी कर सकते हैं। तीसरा- लोगों को सरकारी योजनाओं के बारे में पता नहीं है इसलिए जागरूकता जरूरी है। इसी सोच के साथ सीमा ने लोगों को जागरूक बनाने की मुहिम शुरू की। मुहिम की शुरुआत अपनी ही गली मोहल्ले से की। उन्होंने जो बच्चे फीस नहीं दे सकते उनकी फीस जमा करने का बीड़ा उठाया।

लेकिन सीमा ने फैसला किया कि वे लोगों से सिर्फ सिर्फ एक रुपये की मदद लेंगी। एक रुपये ही क्यों मांगे, इस सवाल के जवाब में वे बताती हैं कि उनका मकसद ज्यादा से ज्यादा लोगों को मदद के लिए जागरुक करना है। जितने बच्चों की समाज से एक-एक रूपये जोड़कर उन्होंने मदद की, कोई एक संपन्न व्यक्ति अकेले ही उतने बच्चों की मदद कर सकता है। लेकिन एक-एक रुपये इकट्ठा करने का मकसद जब लोगों को पता चलता है तो लोग बेहद प्रभावित होते हैं।

सीमा बताती हैं कि कई बार लोग उन्हें ज्यादा पैसे भी देना चाहते हैं। विदेशों से भी मदद के कई प्रस्ताव आए। लेकिन वे यह कहकर मना कर देती है कि दिया तले अंधेरा मत बनिए। आप जहां हैं वहीं लोगों की मदद करिए। सीमा बदलता इंडिया के जरिए संदेश देना चाहती हैं कि जितना संभव हो अपने आप-पास एक दूसरे की मदद कीजिए। एक रुपया मुहिम सिर्फ जरूरतमंद के लिए ही नहीं अपने लिए भी शुरू कर सकते हैं। घर में रोज एक रुपया या उससे ज्यादा पैसे इकट्ठा करने की आदत डालिए। कभी भी ये आपके बहुत काम आ सकता है।

इसके अलावा भी सीमा बच्चों को गुड टच, बैड टच, पॉक्सो एक्ट, मौलिक अधिकारों, बाल विवाह, राइट टू एजुकेशन, बाल मजदूरी को लेकर जागरुक करती रहती हैं। सीमा कहती हैं कि जागरुकता ऐसा कार्य है जिसे कोई भी कर सकता है। अपने कार्यक्षेत्र से जुड़ी जानकारी आस पड़ोस से साझा कर भी उन्हें जागरुक किया जा सकता है। पढ़ाई और मदद की मुहिम के साथ सीमा जुडिशियरी परीक्षा की तैयारी भी कर रही हैं। ‘जज’ बनने का सपना संजोए सीमा अब तक कई मंचों पर सम्मानित हो चुकी हैं।

(स्वाती शैलेश रांची के झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय में मास कम्युनिकेशन एमए द्वितीय वर्ष की स्टूडेंट हैं। सामाजिक विषयों पर लेखन उनका प्रिय शगल है। स्वाती बदलता इंडिया के इंटर्नशिप प्रोग्राम से जुड़ी हैं।)

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