नोएडा गाजियाबाद के शहरी गरीबों को आर्थिक रूप से साक्षर बनाने में जुटी IES

इरादे बड़े सिर्फ साल भर में छह हजार से ज्यादा शहरी गरीबों को आर्थिक सुरक्षा से परिचित करा चुकी हैं स्मिता सिंह।

सारक्षता की अलख जगाते समाज में कई हीरो हमने देखे हैं। लेकिन आज हम बताएंगे कहानी एक ऐसे IRS अफसर की, जिन्होंने वित्तीय साक्षरता की मुहिम छेड़ी है। इस मुहिम की खास बात ये है कि ये समाज में आर्थिक तौर पर सबसे कमजोर वर्गों के लिए चलाई जा रही है। गरीबों को आर्थिक तौर पर मजबूत बनाने की इस मुहिम की कर्ता-धर्ता हैं 2008 बैच की भारतीय राजस्व सेवा की अफसर स्मिता सिंह। वे माइलोकतंत्र फाउंडेशन के जरिए नोएडा और गाजियाबाद में वित्तीय साक्षरता की अलख जगा रही हैं।

इन दिनों मेरठ में बतौर एडिशनल कमिश्नर तैनात स्मिता सिंह बताती हैं कि माईलोकतंत्र समाज के सबसे निचले स्तर पर जाकर लोकतंत्र को बढ़ावा देने वाली जन पहल है। लोकतंत्र की मजबूती के लिए साक्षरता के साथ वित्तीय साक्षरता भी बहुत जरूरी है। मायलोकतंत्र फाउंडेशन एक गैर-लाभकारी पब्लिक ट्रस्ट हैं। स्मिता सिंह इस फाउंडेशन की सह-संस्थापक हैं। संस्था सिर्फ दो-तीन साल पुरानी है। लेकिन पिछले एक साल में नोएडा और गाजियाबाद में शहरी गरीबों के बीच वित्तीय साक्षरता के लिए कई काम किए हैं।

गरीब के पास थोड़े पैसे जमा होंगे

हर गरीब का खाता हो इस लक्ष्य के साथ शुरू गई जन धन योजना सिर्फ एक शुरुआत है। केंद्र सरकार ने एक बड़ा मौका दिया कि हर कोई अपना जन धन खाता खोले। लेकिन सिर्फ खाता खोलना ही योजना का मकसद नहीं था बल्कि जन धन योजना के माध्यम से ख़ास वंचित वर्ग को सशक्त करने के लिए बीमा, पेन्शन, ऋण, छोटी बचत के अवसर प्रदान करना था। इसके लिए वित्तीय साक्षरता सबसे बड़ा मिशन है।

 – स्मिता सिंह, सह संस्थापक, माइलोकतंत्र फाउंडेशन

केंद्र सरकार ने समाज के कमजोर तबके के लिए इंश्योरेंस, बीमा, पेंशन, लोन की कई योजनाएं चला रखी हैं। गरीब के पास थोड़े पैसे जमा होंगे। केंद्र और राज्य सरकारों की सामाजिक सुरक्षा वाली योजनाओं की उसे जानकारी होगी। इन योजनाओं का वो लाभार्थी बनेगा तो उसका जीवन आसान होगा। बस माइलोकतंत्र यही काम करता है। वो समाज के कमजोर तबके को इन योजनाओं का लाभार्थी बनने के लिए वित्तीय साक्षर बनाता है।

मजह 12 रुपये सालाना वाली प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना और 330 रुपये सालाना वाली प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना, ऐसी ही योजनाएं हैं। दोनों योजनाओं में 2 लाख का बीमा कवर होता है। प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना में बीमा पॉलिसी के दौरान पॉलिसीधारक की मौत होने पर नॉमिनी को दो लाख रुपये मिलता है। इसी तरह प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना में पॉलिसीधारक की एक्सीडेंट में मृत्यु होने पर या विकलांग होने पर 2 लाख रुपये की रकम उसके आश्रित को मिलती है।

ये योजनाएं बहुत ही कम पैसे में गरीब को आर्थिक सुरक्षा देती हैं। लेकिन वित्तीय निरक्षरता की वजह से ज्यादातर जरुरतमंद इनका लाभ नहीं उठा पाते। ऐसे में माइलोकतंत्र जैसी संस्थाओं का वित्तीय सारक्षता का काम बहुत ही अहम हो जाता है। वित्तीय साक्षरता के लिए जागरुक करना सबसे अहम कदम है। इसके लिए माइलोकतंत्र फाउंडेशन के सदस्य शहरी गरीबों के इलाकों में जाते हैं। योजनाओं की जानकारी देते हैं। उनकी डिटेल बताते हैं। योजनाओं में लाभार्थी बनने का ना सिर्फ़ तरीका समझाते हैं बल्कि फार्म भरवाकर लाभार्थी को निकट के बैंक तथा पोस्ट ऑफ़िस से समन्वय कर स्कीम का लाभ भी ज़रूर दिलवाते हैं। कई बार टीम ज्यादा जरुरतमंद को लाभार्थी बनने के लिए आर्थिक मदद भी देती है। उनका मकसद असंगठित क्षेत्र के दिहाड़ी मजदूर, रिक्शा चालक, घरेलू सहायक जैसे समाज के सबसे कमजोर वर्ग को सरकार के आर्थिक सुरक्षा के प्रावधानों से परिचित कराकर उनको लाभ दिलाना है।

स्मिता बताती है कि संस्था की टीम फिलहाल नोएडा और गाजियाबाद में शहरी गरीबों के बीच काम कर रही हैं। उनका मकसद घरेलू मेड्ज़, दिहाड़ी मजदूर, रिक्शा चालक, माली सिक्यरिटी गार्ड जैसे समाज के सबसे कमजोर वर्ग को सरकार के आर्थिक सुरक्षा के प्रावधानों से परिचित कराना है। लेकिन चुनौती यहीं खत्म नहीं होती। ज़्यादातर जिन्हें योजना का लाभार्थी बनाना होता है उनके पास जरूरी कागजात तक नहीं होते। ऐसे में टीम आधार कार्ड, जन्म प्रमाणपत्र, राशन कार्ड जैसे जरूरी कागजात बनाने में भी मदद करते है। इसके लिए कैंप का भी आयोजन किया जाता है। संस्था ने एक हज़ार से भी अधिक लोगों व बच्चों के आधार कार्ड बनवाएं हैं।

साल भर में ही माइलोकतंत्र फाउंडेशन नोएडा, गाज़ियाबाद में 47 कैम्प लगा चुका है। करीब 6000 लोगों वित्तीय साक्षर कर चुके हैं। वित्तीय साक्षरता की इस मुहिम में स्मिता सिंह ने एक साल तक हर महीने अपनी करीब आधा सैलरी खर्च करने का फैसला लिया है। वे बताती हैं कि कोरोना काल ने सिखा दिया कि हमारी जरूरतें बहुत कम हैं। ऐसे में सैलरी का आधा हिस्सा खर्च करना उनके लिए मुश्किल नहीं है।

स्मिता बताती हैं उनकी टीम औरतों की वित्तीय साक्षरता पर ज्यादा जोर देती है क्योंकि अगर महिलाएं जागरूक होंगी तो समस्त समाज अपने आप सशक्त हो जाएगा। नोएडा में फाउंडेशन ने ग़रीब बस्तियों में महिलाओं के कुछ स्वयं सहायता समूह बना रखे हैं। एक साल के प्रयास से करीब 100 महिलाएं इससे जुड़ी हैं। आर्थिक तौर पर सबल बनाने के लिए ये खुद अपनी बचत से पैसा इकट्ठा करती हैं और सदस्य महिलाओं को ऋण देती हैं। संस्था इन महिलाओं को स्थानीय संस्थाओं से कई बार रोजगार दिलाने के लिए भी लगातार प्रयास करती रहती है। हाल ही में नोएडा की स्थानीय संस्था जागो भारत से इन्हें ईंट बनाने का ऑर्डर मिला।

स्मिता बहुत ही समर्पित भाव से संस्था से जुड़ी हैं। वे कुछ ऐसा करना चाहती हैं कि ताकि जब भविष्य में अतीत की तरफ देंखे तो उन्हें सुकून हो तो उन्होंने समाज के लिए कुछ अच्छा किया। स्मिता ने एक छोटा कदम उठाया है। लेकिन यात्रा बहुत लंबी है। बदलता इंडिया उम्मीद करती है और शुभकामनाएं देती है कि वे इसी जज्बे और सोच के साथ समाज की बेहतरी के लिए काम करती रहें।

(स्वाती शैलेश रांची के झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय में मास कम्युनिकेशन एमए द्वितीय वर्ष की स्टूडेंट हैं। सामाजिक विषयों पर लेखन उनका प्रिय शगल है।)

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