जानिए कैसे अपने गांव का भूजल स्तर बढ़ा रहे पत्रकार से मुखिया बने अमित

घटता भूजल का स्तर सिर्फ महानगरों की ही नहीं बल्कि गांवों की भी समस्या है। पत्रकार से प्रधान बने अमित जालौन के अपने गांव में भूजल स्तर को उठाने के लिए सोखपिट्स जैसे परंपरागत उपायों को बढ़ावा दे रहे हैं। देश के प्रतिष्ठित पत्रकारिता संस्थान भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई करने वाले अमित बता रहे हैं कैसे भूजल के स्तर को गिरने से रोका जा सकता है।

उन महानगरों को छोड़ दिया जाए जिनमें बोरिंग करने पर सख्त पाबंदी है (न सिर्फ कानूनी रूप से बल्कि हकीकत में भी), तो हर शहर या गांव का भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। इसके कई कारण हैं, लेकिन तीन कारण सबसे ज्यादा प्रमुख हैं। पहला, तालाबों का अतिक्रमण, इसमें स्थानीय निकाय प्रशासन की पूरी मिलीभगत होती है। दूसरा, आबादी वाले इलाकों के हर गली-नुक्कड़ों को सीमेंट से पाट देने का चलन और तीसरा, समर्सिबल पंप का जमकर दुरुपयोग।

भूजल स्तर

घटते तालाब, बढ़ती परेशानी

अब एक-एक करके इनपर थोड़ी बात कर लेते हैं। तालाब भूजल पुनर्भरण का एक प्रमुख स्रोत हुआ करते थे, लेकिन अब ये कूड़े के लिए डंपिंग यार्ड का काम कर रहे हैं। तालाबों के आसपास जिनके घर हैं, वे स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत से इनका अतिक्रमण करने में लगे हैं। ऐसे में दिन-प्रतिदिन न सिर्फ इन तालाबों का आकार कम हो रहा है, बल्कि इनकी संख्या भी घटती जा रही है।

कंक्रीट से बारिश का पानी बेकार

दूसरा कारण है, बेतरतीब सीमेंटेड सड़कों या इंटरलॉकिंग का निर्माण। इनके कारण बारिश की हर एक बूंद शहर या गांव से बाहर भेज दी जा रही है। साथ ही इनके निर्माण से आबादी वाले इलाकों में पेड़-पौधे लगाने की सभी संभावनाएं मिटती जा रही है। ध्यान देने वाली बात है कि पेड़-पौधे न सिर्फ बारिश लाने में महत्ती भूमिका निभाते हैं बल्कि ये भूजल सरंक्षित करने में भी सहायता करते हैं।

भूजल सोख रहे समर्सिबल पंप

तीसरा, समर्सिबल पंपों ने इस विपदा को कई गुना बढ़ा दिया है। एक तो धरती द्वारा पानी को सोखने के सारे रास्ते बंद होते जा रहे हैं। वहीं ये पंप भूजल को तेजी से खत्म कर रहे हैं. तेजी से गिरते भूजल स्तर पर यहां अगर किसी बड़ी रिपोर्ट का हवाला न भी दिया जाए तो जिन घरों में इन पंपों का प्रयोग होता है, उन्हें पता है कि हर साल जलस्तर औसतन 10 फीट नीचे जा रहा है। लेकिन इसके बावजूद पानी को बर्बाद करने में कहीं कोई कोताही नहीं बरती जाती है। मवेशी-जानवरों को नहलाना हो, दरवाजे, सड़कें, वाहनों को धोना हो तो सीधे इनका प्रयोग हो रहा है। जहां दस लीटर पानी में काम चलाया जा सकता है, वहां हजारों लीटर पानी बहा दिया जाता है।

खुद भी आना होगा आगे

ऐसा नहीं है कि इस समस्या से आम व्यक्ति परिचित नहीं है, लेकिन माहौल ऐसा बना है कि हर समस्या के समाधान के लिए सरकार की ओर ताकने की बुरी आदत पड़ चुकी है। कोई ये समझने को तैयार नहीं है कि जब तक हम अपनी आदतों और अपने लालच को सीमित नहीं करेंगे, तब तक कोई सरकार इसमें सहायता नहीं कर सकती।

ऐसे में भूजल पुनर्भरण अनिवार्य हो जाता है। अभी तक इसका प्रावधान सिर्फ सार्वजनिक इमारतों तक सीमित है। उसमें भी अगर अक्सर खानापूर्ति होती ही नजर आती है। भ्रष्टाचार के कारण भूजल संरक्षण के लिए किए जा रहे ये उपाय भी नकाफी साबित हो रहे हैं।

सोखपिट से बढ़ेगा भूजल स्तर

तो फिर सवाल उठता है कि ऐसे में क्या किया जाना चाहिए? इसका जवाब है कि जल्द से लोगों को ये एहसास हो जाना चाहिए कि पानी कोई ऐसा संसाधन नहीं है, जो आप पैसा खर्च करके असीमित समय तक हासिल करते रह सकते हैं। उन्हें ये समझाना होगा कि हर हाल में पानी को बचाना है और जो भी पानी हम इस्तेमाल करें उसके लिए कोशिश होनी चाहिए कि हर घर और हर नल के बाहर सोखपिट (पानी सोखने वाला गड्ढा) का निर्माण हो। इसके निर्माण में बहुत ज्यादा लागत भी नहीं आती।

यहां पर एक बात गौर करने लायक है कि तालाब भी भूजल पुनर्भरण में योगदान करते हैं, लेकिन अगर सोखपिट्स की बात की जाए तो वे तालाबों की तुलना में ज्यादा और बेहतर तरीके से पुनर्भरण करते हैं। इसका कारण उनकी बनावट है। तालाब में कुछ पानी वाष्प बनकर उड़ जाता है, जबकि सोखपिट्स में ऐसा नहीं होता क्योंकि उनके ऊपर एक ढक्कन होता है जो वाष्पीकरण की प्रक्रिया को पूरी तरह रोक देता है।

बदल रहा मेरा गांव मलकपुरा

उत्तर प्रदेश के जनपद जालौन की ग्राम-पंचायत मलकपुरा में ऐसे ही एक प्रयास किया जा रहा है। इसकी शुरुआत फिलहाल ऐसे हैंडपंपों के पास सोखपिट निर्माण से हुई है, जिनके आसपास कच्ची जगह मौजूद है। इसके साथ ही जहां एकदम नई नाली का निर्माण होना है, वहां भी सोखपिट का निर्माण किया जा रहा है। इस तरह ग्राम-पंचायत में एक ही बार में ऐसे कुल चार सोखपिट्स का निर्माण करा दिया गया है, एवं पहले से बंद पड़े दो सोखपिट्स की सफाई करा दी गई है। यानी कुछ 6 सोखपिट्स एक साथ काम करने लगे हैं। अगले चरण में हमारी कोशिश गांव के अंदर आने वाले हर हैंडपंपों के पास सोखपिट निर्माण की है। इसके बाद तीसरे चरण में घरों के बाहर सोखपिट निर्माण की कोशिश की जाएगी। हालांकि ये चरण थोड़ा कठिन होगा, लेकिन गिरते भूजल को देखते हुए हमें इसे धरातल पर उतारना ही होगा।

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