हम भारतीय हैं इसलिए नहीं कि हम भारत में रहते हैं.

भारतवंशी चाहे विश्व के किसी भी कोने में रहे हमेशा उस स्थान और लोगों की भलाई व परोपकार करते हैं। हम भारतीय इसलिए नहीं है क्योंकि हम भारत में रहते हैं, बल्कि इसलिए हैं क्योंकि भारत हम में बसता है। हम चाहे जहां रहे, हममें भारतीयता रहती है।

राष्ट्कवि मैथिलीशरण गुप्त:-

कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर के चरम पर चारों ओर हताशा और निराशा का माहौल था। परिस्थितियां इतनी विषम थी कि उसे शब्दों में नहीं लिखा जा सकता (गिरा अनयन नयन बिनु बानी – अर्थात वाणी के पास नेत्र नहीं है और नेत्रों के पास वाणी नहीं है)। चारों दिशाओं मे बीमारी से संक्रमित मरीजों की दशा और परिजनों का बदहवास घूमना मन को द्रवित कर देने वाला था।

दवाई, इलाज और चिकित्सालय को लेकर लगातार संघर्ष जारी था। ऐसा लगा जैसे राक्षसी प्रवृत्ति जागृत होकर हावी हो गई है। मानवता नैतिक पतन के कगार पर खड़ी है। दवाइयों/ऑक्सीजन की कालाबाजारी, मरीज को लाना-जाना भी बहुत महंगा हो गया। सरकार ने त्वरित कार्यवाही करते हुए इन सभी पर अंकुश लगाया। अभूतपूर्व निर्णय लेकर ट्रेन से ऑक्सीजन की कमी को दूर किया। इस कठिन समय से निपटने में हम सक्षम रहे तो इसकी बड़ी वजह देवत्व का कई गुना प्रभावी रहना रहा।

महामारी के दौर में जब लोग शारीरिक/मानसिक परेशानी से ग्रसित थे। ऐसे समय में कुछ क्षति व परेशानियों के बाद निकल आना, समाज की उच्च मानसिक क्षमता मानी जाएगी। किसी भी समाज की असली परीक्षा तब होती है जब वह अत्यंत कठिन दौर से गुजरते समय कैसा आचरण पेश करता है। इसका ताजा उदाहरण है- हमारा आधुनिक भारतीय समाज, जिसने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि हमारी सभ्यता/संस्कार की जड़ें यूं ही इतनी गहरी नहीं हैं।

चिकित्सालय में सघन ड्यूटी के दौरान, आश्चर्य हुआ कि संक्रमण का खतरा सबसे ज्यादा हमें है, यह जानते हुए भी स्वास्थ्य कर्मचारियों ने सेवा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सभी ने पूर्ण समर्पण के साथ काम किया। लगातार व्हाट्सएप, इंटरनेट, फोन कॉल, संदेशों से दवा या चिकित्सालय संबंधी जानकारी साझा करने के लिए लोग सहायता ले रहे थे। जिसको जितना बन पड़ा उतनी सहायता की। कुछ एंबुलेंस ड्राइवर क्षमता से ज्यादा ड्यूटी कर रहे थे। एक छोटे शहर में एंबुलेंस ड्राइवर ने मां की मौत के बाद भी मरीजों को लाना-ले-जाना जारी रखा। इससे कई जान बच पायी। ऐसी अभूतपूर्व कठिनाई के समय किताबी नैतिकता से परे रहकर समाज ने व्यवहारिक नैतिकता का परिचय दिया। चिकित्सक, नर्स, टेक्नीशियन सभी ने सहयोग किया।

विकट समय में देवालयों ने भी तिजोरी भक्तों के लिए खोल दी। समाज का दिया पैसा समाज के लिए ही उपयोग में आ रहा था, इससे उत्तम और क्या हो सकता है।

सबसे ज्यादा मुश्किल में दिहाड़ी मजदूर थे। ऐसे समय में लोगों/छोटी-बड़ी संस्थाओं ने सहायता की। इन तक खाना पहुंचाया दिल्ली के जफ्फरपुर में कुलदीप जैन, हरियाणा के पलवल में सतवीर अरोड़ा मेरे परिचित हैं। इन्होंने बिना सम्मान या नाम की अपेक्षा के यह पुनीत कार्य किया।

कितने ही परिजन, मृत्यु शैया में पड़े अपने मरीज के अलावा अन्य मरीजों को भी सेवा दे रहे थे। कुछ के परिजन विदेशों से कामकाज छोड़कर अपनों की देखभाल करने आ गए थे। इंग्लैंड में कार्यरत मेरे अपने, प्रिय वरिष्ठ अपनी माताजी के लिए भारत आए। यहां आने पर उन्हें कोरोना के कारण लंबा संघर्ष करना पड़ा। मां के लिए तो आना ही था।

जो मरीज हमें छोड़ कर चले गए उनके परिजनों ने अपनी महंगी दवाइयां व ऑक्सीजन सिलेंडर, दूसरे जरूरतमंदों में वितरित कर दिए। कई ऐसी संस्थाएं/व्यक्ति थे जिन्होंने ऐसे समय में संस्कारपूर्वक अंत्येष्टि का अनूठा काम किया। ज्यादातर दुकानदारों या व्यापारी-समाज ने कामगार को नहीं निकाला। जबकि कई देशों में कंपनियों ने भयंकर छंटनी की। यह कैसी विडंबना है कि हम कठिन दौर में अपनों का साथ छोड़ दें।

इन बातों ने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर हमारी भारत भूमि में ऐसा क्या है कि हम परोपकार करने में पीछे नहीं रहते हैं।

यह बहुत गहरी बात है। हमारी संस्कृति हमें बहुआयामी जीवन जीना सिखाती है, ताकि बहुमुखी विकास हो पाए। चाहे वह खेलकूद हो या मूर्ति बनाना, नृत्य-कला हो या संगीत, पत्थर की नक्काशी हो या तारामंडलों के विस्मयकारी तथ्य, यह सभी हमारे तीज त्यौहारों का हिस्सा है। किसी भी दिशा में परिष्कृत होकर उसकी पराकाष्ठा तक पहुंचना, वह भी कागज की डिग्री और अहम के बिना। हमने नैतिक शिक्षा पर विशेष बल दिया है। ज्ञान जितना बढ़ता जाता है। उतना ही विनम्र होता जाता है।

सदियों से भारत भूमि ज्ञान की गंगा बहाती आई है। ऋषियों-मुनियों ने इसे उच्च मानवीय मूल्यों के आदर्शों से सींचा है। जब हम अपने ज्ञान-विज्ञान, समृद्धि, वैभव, व्यापार आदि की दृष्टि से सर्वोच्च स्थान पर रहे, तब भी हमने दूसरे देशों पर आक्रमण नहीं किया‌। मासूम बच्चों या महिलाओं को नहीं लूटा। क्योंकि यह हमारे रक्त में है ही नहीं। इसलिए यह संस्कृति इतनी पुरातन होने के बावजूद अनवरत चली आ रही है। ऐसा नहीं है कि उच्च मानवीय मूल्यों को मानने वाले अब नहीं है। यह पुरातन काल में भी मौजूद थे और आज भी इसकी उपस्थिति एहसास हमें होता रहता है।

कुछ प्रकरण जो शताब्दियों पहले हुए और आज भी हमें मार्ग दिखाते हैं जो इस प्रकार है…

1). प्रभु श्रीराम ने 7000 वर्षों से भी पहले स्वर्णमई लंका को जीतने के बाद, राजकाज विभीषण को दे दिया था और वापस अयोध्या लौट रहे थे क्योंकि (जननी जन्मभूमिश्च…….) माता व मातृभूमि दोनों स्वर्ग से बढ़कर है, मुझे सोने की लंका नहीं चाहिए।

2). लगभग 2300 साल पहले सिकंदर ने गुरु अरस्तु के आदेशानुसार सैनिकों को एक भारतीय संत को लेने भेजा। सैनिकों ने संत से कहा कि वह यूनान चलें। उन्हें मालामाल कर दिया जाएगा। तो संत ने पूछा, क्या तुम्हारा सम्राट सिकंदर मुझे वह सब कुछ दिला पाएगा जो मुझे चाहिए? सिपाही ने हां कहा, तो संत ने पूछा कि क्या वह मुझे यह शस्य-श्यामला धरती दिला पाएगा? गंगा जी की निर्मल शुद्ध धारा? ऋषि मुनियों की पावन भूमि उपलब्ध करा पाएगा? इस पर सैनिक निरुत्तर हो गया। संत ने कहा कि तुम्हारे सम्राट को पता ही नहीं है कि मन की शांति और संयम ही सर्वोपरि होता है। मेरी दृष्टि में वह एक दरिद्र से ऊपर कुछ नहीं, वह मुझे क्या देगा।

3) महर्षि दधीचि के समान अपना जीवन दूसरों के लिए त्यागने वाले एक सेवामयी बुजुर्ग (नारायण दाभोलकर, महाराष्ट्र) ने प्राणों की परवाह न करते हुए चिकित्सालय में मिला बिस्तर छोड़ दिया। उन्होंने कहा कि नौजवान के परिवार को इसकी ज्यादा आवश्यकता है। मेरी उम्र हो चुकी है। मतलब साफ है कि आज भी हम किताबी ज्ञान में नहीं, व्यवहारिक मानवीय मूल्यों व प्रासंगिक मानव धर्म को निभाने में पीछे नहीं हटते हैं।

हम भारतवंशी चाहे विश्व के किसी भी कोने में रहे हमेशा उस स्थान और लोगों की भलाई व परोपकार करते हैं, जैसा कि कुछ दिनों पहले अमेरिका व अन्य पश्चिमी देशों में भारतीय लोगों ने खाना खिलाया व राहत सामग्री पहुंचाने में सहायता प्रदान की। हम भारतीय इसलिए नहीं है क्योंकि हम भारत में रहते हैं, बल्कि इसलिए हैं क्योंकि भारत हम में बसता है। हम चाहे जहां रहे, हममें भारतीयता रहती है। यह शायद हमारे वातावरण, पवित्र मातृभूमि व ऋषि मुनियों के द्वारा निरंतर परिष्कृत करने करने के कारण है। यह सतत चलने वाली प्रक्रिया है ताकि हम देश, काल और परिस्थिति के अनुसार बदल पाए‌। हम सभी को यह बात संज्ञान में रखनी चाहिए और इस गहरी नैतिकता और व्यवहारिक ज्ञान को मानव जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए ताकि प्रभु कृपा से प्राप्त, विवेकपूर्ण मानव-जीवन सार्थक हो सके।

डॉ. भुवन पाण्डेय:

क्षुधार्त रंतिदेव ने दिया करस्थ थाल भी, तथा दधीचि ने दिया परार्थ अस्थिजाल भी

उशीनर क्षितीश ने स्वमांस दान भी किया, सहर्ष वीर कर्ण ने शरीर-चर्म भी दिया

अनित्य देह के लिए अनादि जीव क्या डरे, वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।

“परहित सरिस धर्म नहिं भाई, पर पीड़ा नहीं कछु अधमाई”

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