वन सेवा अधिकारी ने दो साल में वन भूमि को बनाया कचरा डंप



संध्या: वन विभाग चंडीगढ़ ने, भारतीय वन सेवा (IFS) के अफसर डॉ. अब्दुल कय्यूम की अगुवाई और सीसीएफ़ देबेंद्र दलाई के दिशा निर्देश में महज कुछ ही महीनों में कूड़ाघर बन चुके भूखंड को जंगल में बदल दिया। जंगल के रखवाले इस अफसर ने दो साल में 10 हजार से ज्यादा पौधे लगवा दिए। इस पहल से चंडीगढ़ शहर को ऑक्सीजन की एक और प्राकृतिक फैक्टरी मिल गई है।

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ग्रीनसिटी में वनभूमि कैसे बना कूड़ाघर

भारतीय वन सेवा के अफसर डॉ. कय्यूम को साल 2018 में बतौर डीएफओ चंडीगढ़ में तैनाती मिली। चंडीगढ़ वैसे तो नियोजित शहर माना जाता है। यहां शहर के बीच में पार्क और छोटे-छोटे भूखंड पर सघन वन हैं। लेकिन इसी शहर में स्थानीय लोगों ने वन विभाग के 30 एकड़ के बड़े भूखंड के अधिकांश भाग को कूड़ाघर में तब्दील कर दिया था। साल 2019 के आखिरी दिनों में डॉ. कय्यूम की जानकारी में ये मामला आया। टीम के साथ वे मौके पर पहुंचे तो हालत देखकर हैरान हो गए। शहर के बीचो बीच ये भूखंड कूड़े से अटा पड़ा था। कूड़े के बीच जानवर घूम रहे थे। दुर्गंध इतनी कि अंदर घुसना मुश्किल था।

हालात बदलने की कवायद

हालांकि वन विभाग ने इस भूखंड की फेंसिंग कर रखी थी। लेकिन उपयुक्त गेट ना होने और मॉनिटरिंग की कमी की वजह से ये स्थिति बनी हुई थी। अब यहां हालात बदलने की कवायद शुरू हुई। सबसे पहले गेट पर सुरक्षा गार्ड की तैनाती हुई। स्थानीय लोगों से इस भूखंड में कूड़ा ना फेंकने की अपील तो की ही गई। साथ ही कड़ी चेतावनी भी दी गई कि अगर वन विभाग की इस संरक्षित जमीन पर कूड़ा फेंका तो खैर नहीं और चेतावनी बोर्ड लगाए गये कि कड़ी कानूनी कार्रवाई तो होगी ही साथ ही जुर्माना भी देना पड़ेगा।

चेताया, समझाया और बन गई बात

चेतावनी और समझाने का असर धीमे धीमे दिखने लगा। कूड़ा फिंकना बंद हुआ। साफ सफाई का दौर शुरू हुआ। जमीन की सतह को ठीक किया गया। प्लास्टिक के कचरे को हटाया गया। साफ सफाई होने के बाद पौधारोपण की तैयारी हुई। जुलाई 2020 में बारिश के मौसम में इस भूखंड में 6000 पौधे लगाए गए। इस कठिन कार्य में वहां तैनात फ़ॉरेस्टर जितेंद्र सिंह बड़ा योगदान रहा।

अभिशाप कूड़ा बन गया वरदान

डॉ. कय्यूम बताते हैं कि इस जमीन पर लगाए गए पौधों में अप्रत्याशित वृद्धि देखने को मिली। जुलाई 2020 में चार से पांच फीट के पौधे लगाए गए थे। महज साल भर में पौधों की लंबाई दोगुने से ज्यादा हो गई है। इस भूखंड में फल देने वाले पौधों के साथ स्थानीय पारिस्थितिकी के मुताबिक पौधे लगाए गए। इस साल मानसून की बारिश होने के बाद साथ लगे भूभाग में करीब 4000 पौधे लगाए गए हैं। चण्डीगढ़ में मौजूद CRPF भी इस अभियान में शामिल रही। इसमें मुख्यतः गुलमोहर, पलाश, लर्गेस्ट्रोमिया, नीम, डेक, आम, जामुन इत्यादि लगाए गए हैं। डॉ. कय्यूम बताते हैं, जब इन पौधों में फूल लगेंगे तो यहां खूबसूरती देखने लायक होगी और फलदार वृक्ष जंगली जीव जंतुओं के लिए काफ़ी उपयोगी होंगे।

मोबाइल एप से घटाई जंगल की आग

डॉ. अब्दुल कय्यूम इससे पहले भी पर्यावरण के रक्षक के तौर हमेशा कुछ ना कुछ नया सोचते रहते हैं। वे बताते हैं कि जंगल को इंसानों के अलावा जिससे सबसे ज्यादा खतरा है वो है आग। वनों में आग के ज्यादातर मामले इंसानी गलती के भयावह नतीजे होते हैं। चंडीगढ़ से पहले अरुणाचल प्रदेश में तैनाती के दौरान उन्होंने इस पर गहन शोध किया। इस शोध में उन्होंने अरुणाचल के जंगलों में आग लगने के आशंकाओं का सटीक अनुमान का मैकेनिज्म पेश किया। इस शोध से मिले डेटा से बने मैकेनिज्म पर एक मोबाइल एप ई-फॉरेस्टफ़ायर बना। इसके नतीजे उत्साहवर्धक रहे।

अरुणाचल के जंगल में आग लगने की घटनाओं में करीब एक तिहाई की कमी दर्ज की गई। इस प्रयास को फ़रवरी 2020 में भारत सरकार के कार्मिक एवम प्रशासनिक सुधार मंत्रालय ने राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित किया।

IFS अफसर डॉ. अब्दुल कयूम – एक परिचय

बचपन से ही हरियाली से नाता रहा। पढ़ाई के लिए शहर आए तो जिन कैंपस में दाखिला मिला वहां खूब हरियाली देखी। हरियाली और प्रकृति बचपन से ही उनके जेहन में रची बसी रही।

उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले के एक गांव में शुरुआती पढ़ाई हुई। स्कूल टीचर के बेटे अब्दुल मेधावी छात्र थे। छठीं में गांव से बाहर निकले तो जवाहर नवोदय विद्यालय में दाखिला मिला। 12वीं के बाद बढ़िया रैंकिंग से आईआईटी की परीक्षा पास की। कानपुर आईआईटी में बीटेक (सिविल इंजीनियरिंग) में एडमिशन मिला। बाद में पीएचडी करने हरियाली से घिरे जेएनयू आए। यहां से बॉयोइनफॉर्मेटिक्स में पीएचडी की उपाधि हासिल की। हमेशा हरियाली के बीच रह कर पढ़ाई करने वाले डॉ. कय्यूम को नौकरी पर्यावरण की रक्षा करने वाली मिली। 2013 में उनका अखिल भारतीय वन सेवा के लिए चयन हुआ। फिलहाल हरियाली में पले बढ़े डॉ. अब्दुल कय्यूम अब बतौर भारतीय वन सेवा के अधिकारी पर्यावरण के रखवाले बनकर प्रकृति का कर्ज अदा कर रहे हैं।

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