प्रयागराज कुंभ मेला | कुम्भ मेला Prayagraj 2025 | 2022 में कुंभ मेला कहां लगेगा

प्रयागराज कुम्भ का स्वरूप बहुत ही वृहद है। झारखण्ड पर्यटन विभाग ने भी कुंभ में मंडप स्थापित किया है। मंडप का प्रारूप बाबा वैद्यनाथ धाम को ध्यान में रख कर बनाया गया है।

वैद्यनाथ मन्दिर द्वादश ज्योतिर्लिंग में एक ज्योतिर्लिंग है। ये झारखंड के देवघर जिले में है। “देवघर” यानी देवताओं का घर। यह ज्‍योतिर्लिंग एक सिद्धपीठ है। ये कहा जाता है कि यहां आने वालों की सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इस कारण इस लिंग को “कामना लिंग” भी कहा जाता है।

झारखण्ड पूरी दुनिया में अपनी खनिज सम्पदा के लिए जाना जाता है। यहाँ जनजातीय समुदाओं की भी बहुतायत में हैं। जिसके फलस्वरूप जनजातीय रहनसहन, खानपान और उनकी संस्कृति को भी प्रदेश के ज्यादातर हिस्से में देखा जा सकता है। इस सारी विविधताओं और विशेषताओं के साथ राज्य एक विशेष धार्मिक स्थल के लिए भी विश्व विख्यात है। ये धार्मिक स्थल है बाबा वैद्यनाथ का धाम। वैद्यनाथ मन्दिर द्वादश ज्योतिर्लिंग में एक ज्योतिर्लिंग का पुराणकालीन मन्दिर है। ये झारखंड के देवघर जिले में है। “देवघर” यानी देवताओं का घर। यह ज्‍योतिर्लिंग एक सिद्धपीठ है। ये कहा जाता है कि यहां आने वालों की सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इस कारण इस लिंग को “कामना लिंग” भी कहा जाता है।

हिन्दू मान्यता के मुताबिक एक बार राक्षसराज रावण ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए हिमालय पर घोर तपस्या की और अपना सिर काट-काटकर शिवलिंग पर चढ़ाने शुरू कर दिए। एक-एक करके नौ सिर चढ़ाने के बाद रावण दसवां सिर भी काटने को ही था कि शिवजी प्रकट हो गये। उन्होंने रावण से  वरदान मांगने को कहा। रावण लंका में जाकर शिवजी को लिंग रूप में स्थापित करने के लिये आज्ञा मांगी। शिवजी ने अनुमति तो दे दी, पर इस चेतावनी के साथ कि यदि मार्ग में रावण शिवलिंग को पृथ्वी पर रख देगा तो वह वहीं अचल हो जाएगा।

रावण शिवलिंग लेकर चला पर मार्ग में एक चिताभूमि आने पर उसे लघुशंका निवृत्ति की आवश्यकता हुई। रावण उस लिंग को एक अहीर को थमा लघुशंका-निवृत्ति करने चला गया। उस अहीर से शिवलिंग बहुत अधिक भारी अनुभव होने लगा। उसने शिवलिंग को भूमि पर रख दिया। उसके बाद रावण पूरी शक्ति लगाकर भी शिवलिंग उठा न सका और निराश होकर शिवलिंग पर अपना अंगूठा गड़ाकर लंका चला गया। यही स्थान बाबा बैद्यनाथ धाम के नाम से जाना गया।

इस वर्ष प्रयाग राज कुम्भ का स्वरूप बहुत ही वृहद है। झारखण्ड पर्यटन विभाग ने भी कुंभ में मंडप स्थापित किया है। मंडप का प्रारूप बाबा वैद्यनाथ धाम को ध्यान में रख कर बनाया गया है।

प्रयागराज कुम्भ मेला की भी मान्यता है कि इसकी शुरुआत समुद्र मंथन से निकली अमृत की बूंदों के पड़ने के बाद हुई। कुम्भ का प्रथम स्नान नागा संतों द्वारा ही किया जाता है। उसके बाद ही कुम्भ का पवित्र स्नान आम जनमानस के लिए खोला जाता है। नागा संत भगवान् शिव के अखंड भक्त माने जाते है। उनकी जीवन शैली, भक्ति शिव के अनुयाइयों में सर्वोच्च मानी जाती है।

इस वर्ष प्रयाग राज कुम्भ को बहुत ही वृहद बनाया गया है। इसे ध्यान में रख कर झारखण्ड पर्यटन विभाग ने अपना मंडप स्थापित किया है। मंडप का प्रारूप बाबा वैद्यनाथ धाम को ध्यान में रख कर बनाया गया है। मंडप के मुख्य द्वार पर भगवान् शिव की विशाल प्रतिमा स्थापित की गई है। मंडप के मध्य भाग में शिवलिंग और उसके जलाभिषेक के जीवंत प्रारूप को देखा जा सकता है। मंडप में बाबा वैद्यनाथ से जुडी जानकारियां दिखाई गई हैं। ताकि यहां आने वाले संत, देश और विदेश के श्रद्धालुओं को बाबा वैद्यनाथ से जुड़ी जानकारी दी जा सके। प्रयागराज कुम्भ में झारखण्ड पर्यटन का यह मंडप अपने अनूठे अंदाज में दिख रहा है।

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