धरती को बचाना है तो कोरोना काल के सबक याद रखें। covid 19

प्रकृति अगर भयावह रूप ले लेती है तो मनुष्य का उसके सामने कोई अस्तित्व नहीं रह जाता है। इसका उदाहरण हमने कई बार देखा है। वर्ष 2021 में तो सम्पूर्ण विश्व ने प्रकृति का लोहा माना, जब कोरोना महामारी ने अचानक सभी परिदृश्य ही बदल दिए। मनुष्य प्रजाति वर्षों से पर्यावरण का शोषण कर रही है। इस वजह से पर्यावरणीय समस्याएं जैसे वायु, जल, ध्वनि प्रदूषण इस स्तर तक पहुंच जाता है कि यह स्वयं मानव प्रजाति के लिए जानलेवा हो जाता है।
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वायु प्रदूषण:-

उत्तर भारत के अधिकतर शहर तो साल भर वायु प्रदूषण से पीड़ित रहते है। सर्दियों में तो राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) वायु प्रदूषण जानलेवा स्तर तक बढ़ने के कारण रेड अलर्ट भी घोषित कर देता है। विश्व के 10 सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में 6 शहर भारत से शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट भी केंद्र और राज्य सरकारों को समय-समय पर इस विषय पर निर्देश भी देता रहता है। इन सब घटनाक्रमों के बावजूद  मनुष्य अपनी जीवनशैली के बारे में सोचने को तैयार नहीं है। वह पर्यावरण संरक्षण और पर्यावरण प्रबंधन की आवश्यकता को महत्वपूर्ण मानता तो है, लेकिन उसके शोषण को कम करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाता।

इन सबके बीच में चीन के वुहान शहर से पैदा हुई महामारी कोरोना, मार्च 2020 में भारत पहुंच गई। देश भर में लॉकडाउन लगाना पड़ा। लॉकडाउन का नकारात्मक असर जहां एक तरफ आर्थिक क्षेत्र पर दिखा, वहीं दूसरी ओर शिक्षा भी इससे प्रभावित हुई है। बेरोजगारी से आम जनमानस परेशान है तो पर्यटन से जुड़े हुए लोग तो हाशिए पर है। अगर कोई सकारात्मक सूचना 2020 में मिली है, तो उसमें से एक है कि पर्यावरण पर कोरोना महामारी की वजह से लगे लॉकडाउन का सकारात्मक असर पड़ा है। इसमें हवा की गुणवत्ता अच्छी होना, ध्वनि प्रदूषण कम होना, नदियों का पानी स्वच्छ हो जाना और पशु-पक्षियों और अन्य वन्य जीवों को नया जीवन मिल जाना शामिल है।

अगर वायु प्रदूषण की ही बात करें तो अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने कहा है कि उत्तर भारत में वायु प्रदूषण 2020 में 20 सालों के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है। नासा में वैज्ञानिक पवन गुप्ता कहते हैं, “हमें पता था कि लॉकडाउन के बीच हम कई जगहों पर वायुमंडल में बदलाव देखेंगे। लेकिन मैंने साल की इस अवधि के दौरान गंगा के मैदान में एयरोसोल में इतनी कमी पहले कभी नहीं देखी थी।” आसमान में मौजूद धूल के सूक्ष्म कण यानी एयरोसोल में भी कमी आयी है। आसमान में मौजूद धूल के सूक्ष्म कण सांस और फेफड़ों से संबंधित कई बीमारियों को जन्म देती है।

वायु प्रदूषण कम होने से दूर-दराज के पहाड़ भी शहरों से दिख गए। जालंधर के लोगों को लगभग 200 किलोमीटर दूर स्थित बर्फ से ढकी धौलाधार की पहाड़ियां दिखने लगी। बिहार के सीतामढ़ी जिले के सिंहवाहिनी गांव से हिमालय की चोटियां दिखीं। वायु प्रदूषण कम होने के मुख्य कारण है,  कोरोना महामारी की वजह से निर्माण के काम में कमी आना, वाहनों, फैक्ट्री और कारखानों से पैदा होने वाले प्रदूषण में कमी आना आदि। महानगरों में प्रदूषण के कारण पहले रात्रि में तारे ना के बराबर दिखते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं है। कोरोना महामारी काल में एक तरफ जहां गाड़ी और मोटरसाइकिल की बिक्री में भी कमी आई है वही दूसरी तरफ साइकिल धड़ल्ले से बिक रही है।

कोरोना महामारी की वजह से लगे लॉकडाउन में पतित पावनी मां गंगा और यमुना नदी का पानी भी स्वच्छ और कंचन हो गया है। फैक्ट्रियों और कारखानों से निकलने वाले ख़राब अवशेषों को सीधा नदियों में बहा दिया जाता था। लेकिन लॉकडाउन की वजह से सैकड़ों कारखाने अस्थाई रूप से बंद हो गए हैं। इसके कारण नदियों के पानी की गुणवत्ता अच्छी हो गयी है। नदियों और नालों में कचरा फेंकने की घटनाओ में भी कमी आई है। साथ ही साथ पर्यटन रुक जाने के कारण भी जल प्रदूषण में कमी आई है।

महानगरों में ही नहीं छोटे नगरों और तहसीलो में भी ध्वनि प्रदूषण एक समस्या के तौर पर उभरकर आया है। कोरोना महामारी ने सड़कों पर यातायात कम कर दिया है। शादियों और अन्य व्यावसायिक कार्यक्रमों में भी कमी आई है। कल-कारखाने बंद हैं। इसके कारण ध्वनि प्रदूषण में कमी आई है। चिड़ियों की चहचहाहट अब दिन भर सुनने को मिलती है। कोरोना महामारी की वजह से वन्य जीवों को भी अद्भुत लाभ हुआ है। देश के अलग-अलग नगरों में वन्य जीव दिखने को मिले हैं। इसमें नीलगाय, हाथी, कछुआ शामिल हैं। पक्षियों में मोर की आवाज़ अब सालों बाद महानगरों में भी सुनने को मिली है। ये दुर्लभ हो गई थी। विदेशों से आने वाले प्रवासी पक्षियों में भी वृद्धि हुई है।

लॉकडाउन से पर्यावरण में आये सकारात्मक परिवर्तन क्या किसी स्थायी बदलाव के तौर पर देखे जा सकते हैं?  वर्त्तमान समय में आये हुए परिवर्तन के कारण जो कार्बन उत्सर्जन (कार्बन डाईऑक्साइड औऱ मीथेन) में कमी आई  है। वह आने वाले समय में फिर बढ़ने लगेगा। औद्योगिक क्षेत्रों में नाइट्रोजन डाईआक्सॉइड की मात्रा फिर से उसी जानलेवा स्तर पर पहुंच जाएगी। कचरे के प्रबंधन का विषय तो कोरोना महामारी के काल में भी उभर के सामने आया है।

ऐसे में पर्यावरण संरक्षण और पर्यावरण प्रबंधन के प्रति जागरूक होने की आवश्यकता है। कोरोना महामारी ने मनुष्य जाति की आंखें खोल दी है। अब हमे अंधे विकास की जगह जीवन देने वाले पर्यावरण को नष्ट नहीं करना है। क्योंकि ऐसा करके हम अपने जीवन को ही नहीं आने वाली पीढ़ियों को भी नष्ट कर रहे हैं।

(लेखक निखिल यादव विवेकानंद केंद्र के उत्तर प्रान्त के युवा प्रमुख हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में परास्नातक है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से वैदिक संस्कृति में सीओपी कर रहे हैं। यह उनके निजी विचार हैं)

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