मनुस्मृति क्या है? – मनुस्मृति को लेकर अक्सर क्यों विवाद खड़ा हो जाता है?

पाश्चात्य प्रभाव से अधिक धन, सुख, मान मर्यादा व अन्य जरूरतों की चाह में हमारे समाज में महिलाएं गृहणी से कामकाजी हुईं। वक्त के साथ महिलाओं ने अपने को वाह्य कार्य करने के हिसाब से ढाल लिया। लेकिन ये इतना आसान न था। अब वे दफ्तर के साथ घर की व्यवस्था भी देखने लगी। महिलाओं की भूमिका के इस बदलाव की गंभीर विवेचना करता पढ़िए एनीस्थिसिया (सर्जरी के वक्त बेहोशी की दवा देने वाले डॉक्टर) के विशेषज्ञ डॉ. भुवन पाण्डेय का आलेख।

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।।

जहां स्त्रियों की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं और जहां स्त्रियों की पूजा नहीं होती है, उनका सम्मान नहीं होता है वहां किये गये समस्त अच्छे कर्म निष्फल हो जाते हैं

मनुस्मृति क्या है? - मनुस्मृति में क्या लिखा है?

कुछ समय पूर्व लिखे लेख ‘गृहणी’ के बारे में लिखते समय कई बार ऐसे विचार मन में हिलोरे ले रहे थे कि जैसे कि मैं थोड़ा पक्षपाती हो रहा हूं और कामकाजी महिलाओं को कुछ कमतर आंक रहा हूं, हालांकि मेरे मन में किसी के प्रति ऐसी सोच नहीं थी। यह लेख लिखने के बाद आई प्रतिक्रिया, गहरी मार्मिकता से भरे संदेशों व साधुवाद ने यह स्पष्ट कर दिया कि कामकाजी गृहणियों की संघर्ष गाथा भी किसी माने में कम नहीं है। इसका एहसास मुझे तब हुआ जब कोरोना-काल में गृह कार्य के लिए कोई सहायता उपलब्ध नहीं थी और सभी काम-काज पति-पत्नी द्वारा मिलकर किये जा रहे थे, (दफ्तर का काम व गृहकार्य) यह काम इतना भी आसान नहीं है जितना कि बस बोल देना कि फलां चीज कर देना, और वह पलक झपकते ही जाए और जरा सी देर होने पर बड़ी आसानी से कोई अपशब्द कह देना।

यह सर्व विदित है कि शिव भी शिवस्वरूप तब है जब तक शक्ति का साथ है। बिना शक्ति के शिव भी शव के समान है। सदियों पहले लिखे बृहदारण्यक उपनिषद के अनुसार जिस प्रकार सीप या चने के दाने हमें ऊपर से एक ही दिखाई देते हैं, पर असल में वो दो समान भाग में बंटे होते हैं, उसी प्रकार गृहस्थ जीवन में गृहस्थी तो एक है पर स्त्री-पुरुष दोनों उसके बराबर के भागीदार होते हैं या एक दूसरे के पूरक होते हैं। अथवा सीधे शब्दों में यह कहें कि एक सुखपूर्वक गृहस्थ जीवन के लिए दोनों ही के समान कार्यों की जरूरत होती है, जिससे कि संतुलन बना रहता है। आश्चर्य की बात यह है कि इतनी सूक्ष्म बात भी हमें पुरातन काल से ही स्पष्ट थी। किन्तु इसका एक दूसरा पहलू यह भी है कि प्रत्येक क्षेत्र में ऐसा सम्भव नहीं है, दोनों को प्राकृतिक रूप से मिले गुणों के आधार पर पर भी काफी सारे कार्य निर्भर करते हैं, जैसे कि स्त्री का बच्चों को जन्म देना, स्तनपान, पालन, पोषण तथा घर के बहु-आयामी कार्यों के कुशलतापूर्वक पूरा करना, इसे निभाने में अपार धैर्य व गहरी सहनशीलता की जरूरत होती है। यही कारण है कि हमारा कोई भी त्योहार या अनुष्ठान, बिना स्त्रियों की दिव्य आभा व कार्य कुशलता की सम्भव नहीं है।

दूसरी ओर पुरुष का एक योद्धा की तरह काम करना परिवार की छोटी बड़ी आवश्यकताओं को पूरा करना, सुरक्षा प्रदान करना यह लगातार किया जा रहा कठिन परिश्रम उन्हें थोड़ा कठोर भी बना देता है। शताब्दियों से ये व्यवस्था सुचारु रूप से चली आ रही थी। पर कालान्तर में पाश्चात्य प्रभाव से इस व्यवस्था में बदलाव आया और अधिक धन, सुख, मान मर्यादा व अन्य आवश्यकताओं की चाह में पढ़े-लिखे होकर कार्य करना जरूरी समझा जाने लगा। समय के साथ-साथ धीरे-धीरे महिलाओं ने अपने को बाह्य कार्य करने के हिसाब से ढाल लिया, जो इतना आसान न था। अब वे अपने दफ्तर के कार्य के साथ-साथ घर की व्यवस्था भी देखने लगी, हालांकि इसमें वो मानसिक व शारीरिक रूप से थकने लगी हैं, लेकिन फिर भी अपने कार्यों को सुचारू रूप से अंजाम देने का पूरा प्रयास करती हैं। हालांकि अब इसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगे हैं, चिड़चिड़ापन, गुस्सैल स्वभाव व सौम्यता की कमी, साथ ही साथ खुद का कमाया पैसा आ जाने से स्वभाविक तौर पर कुछ अहं की भावना भी आमतौर पर देखने को मिल जाती है।

भारतीय समाज एक पुरुष प्रधान समाज माना जाता है जहां पुरुष की गृह कार्य में रुचि कम ही होती है तथा रसोई व अन्य कार्यों में कम ही हाथ बंटाते नजर आते हैं। जिसमें कि अधिकतर बोझ स्त्रियों पर ही पड़ता है। इसका अर्थ सीधे तौर पर यह हुआ कि स्त्रियां तो समय के अनुकूल ढल गयी किन्तु पुरुषों के मन-मस्तिष्क में अभी भी वही पितृसत्तात्मक सोच व अहं विद्यमान है और वह इस बदलाव के हिसाब से नहीं ढल पाये हैं। हालांकि नयी पीढ़ी के कुछ नौजवान पुरुष इस बात को मानने लगे हैं तथा गृहकार्य में मदद भी करते हैं, परन्तु अधिकतर ऐसा कम ही देखने को मिलता है जहां दोनों गृहकार्य को भी आधा-आधा बांट कर करते हों। यहां यह बात समझनी चाहिए कि स्त्री भी उतनी ही थकी हुई घर आती है जितने की पुरुष, पर सभी पुरुष अपनी पत्नी से अपेक्षा पूरी रखते हैं कि सारा गृह काम स्त्रियां ही करें चाहे वह कितनी ही थकी हुई या परेशान क्यों न हो। शायद यही कारण हे कि कई कामकाजी महिलाओं ने तो मुझे यहां तक कहा कि लगता है जैसे कि कामकाजी होकर हमने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है, क्योंकि अब दोनों कार्य जैसे उन्हीं की जिम्मेदारी है।

ऐसी परिस्थिति में घर में तनाव होना स्वाभाविक है। तनाव बढ़ने पर प्रेम की कमी ही जाती है और ये जब उनकी सहन क्षमता के पार पहुंच जाता है तो गृह क्लेश होता है और घर में अशांति का वातावरण बन जाता है। प्रेम और रस से रहित घर में सौहार्द की कमी हो जाती है तथा परिवार के प्रत्येक सदस्य पारिवारिक जीवन से ज्यादा व्यक्तिगत जीवन जीने लगता है। एक छत के नीचे साथ रहने पर भी लगाव की कमी से प्रेममय संबंध का ताना बाना टूटने लगता है और यह संबंध केवल नाममात्र का रह जाता है। ऐसे माहौल में विषम परिस्थितयां आने पर पारिवारिक क्लेश चरम पर पहुंच कर विघटन की पराकाष्ठा तक पहुंच जाता है और कई बार तो परिस्थितयां यहां तक आ जाती है कि परिवार टूट कर बिखर जाते हैं। दिल्ली व मुम्बई जैसे महानगरों में कराए गए सर्वे के अनुसार यहा पर 40 फीसदी तक शादियां टूट जाती हैं, जो कि बहुत दुखद व चिन्ताजनक बात है।

एक दूसरे के लिए समय ना होने से साथ रह रही तीनों पीढ़ियां इस चुभन को सहन करती हैं। सबसे पहले है दादा-दादी – जो कि अपने बच्चों को पाल चुके व अपनी जिम्मेदारी निभा चुके हैं और अब उनका आराम करने व तीर्थाटन का समय है। बेटे-बहू के कार्य एवं व्यस्तता के कारण उन्हें उनके बच्चों की जिम्मेदारी व देख-रेख करनी पड़ जाती है जिसके लिए कई बार वो शारीरिक व मानसिक रूप से सक्षम भी नहीं होते हैं और असल में तो ये कार्य भी पूरी तरह से उनका नहीं है। वे ऊपरी देख-रेख या आपातकालीन समय में एक उचित व भरोसेमंद सहायक हो सकते हैं। इसलिए मेरी समझ में यह कार्य उन पर थोपना उचित नहीं है पर जो सक्षम है व स्वेच्छा से करना चाहे तो बात अलग है।

कामकाजी पति पत्नी के मन में हमेशा यह रहता है कि पैसा कमा लें ताकि बच्चों का भविष्य उज्जवल कर सकें साथ ही अन्य चीजें भी जोड़ लें। ये सभी लालसाएं धीरे-धीरे और बढ़ती जाती है ज्यादा पैसा फिर और ज्यादा, जरूरत से बड़ी आकांक्षाए ज्यादा बड़ा घर व गाड़ी हम सभी उस कभी न खत्म होने वाली होड़ में शामिल हो जाते हैं। आयु का यह समय ऊर्जा से भरा हुआ होता है और वो इसे उस दिशा में उपयोग करना चाहते हैं। अधिकतर समय कार्यक्षेत्र में होने के कारण घर में कम समय व्यतीत करने का मलाल उन्हें भी रहता है। इसलिए वो रविवार या छुट्टियों में भी घर पर नही रहना चाहते हैं और कहीं बाहर जाकर घूमते हैं ताकि परिवार को समय दे सकें और जीवन में कुछ नयापन हो। पूर्व समय में जब अधिकतर समय घर पर ही बीतता था फिर भी कभी-कभार घूमने जाने पर भी कोई शिकायत नहीं होती थी। शायद इसलिए आपसी समझ-बूझ ज्यादा थी हमारे बुजुर्गों ने पुराने दिनों में कम पैसा होते हुए भी सभी जिम्मेदारियां निभा दी। महिलाएं अपनी वरिष्ठ व अनुभवी औरतो से तरह-तरह के स्वादिष्ट-पारंपरिक व्यंजन की बारीकियां, कठिन परिस्थितयों में सूझ-बूझ दिखाना तथा संस्कृति के गूढ़ तथ्यों को भी समझ पाती थी जिससे कि उन्हें गहराई में समझ पाएं व आगे बढ़ा पाएं।

नई पीढ़ी के नौनिहाल जो कि नई सोच व क्षमता रखते हैं घर में किसी के ना होने पर, व माता-पिता पास पर्याप्त समय न होने से मोबाइल, कंप्यूटर के गेम में ही अपना मनोरंजन करते हैं खेल के मैदान में उनके न खेलने से दोस्तों के साथ दौड़-भाग नहीं हो पाती है शारीरिक श्रम न होना व बैठे-बैठे खाने से बच्चों में मोटापा भी बढ़ने लगा है जो कि शायद हमने कभी देखा ही नहीं था। आजकल के बच्चे समय-समय पर अपनी बेतुकी मांग भी कर देते हैं और मांग पूरी न करने पर कुछ अन्य तरीके अपनाते है। ऐसे समय में बच्चों को समझाना व उलझना समय बर्बाद करना लगता है, पास में पैसा होने की वजह से उनकी मांग जल्दी ही पूरी होने लगती हैं और धीरे-धीरे वो जिद्दी या कहना न मानने वाले बनते जाते हैं। साथ ही साथ उनके मन में असुरक्षा की भावना भी घर करने लगती है। यह सभी कारण उन्हें मानसिक रोगी बनने की दिशा में अग्रसित करते हैं। पिछले लगभग तीन दशकों (1990-2017) में भारत की मानसिक रूप से बीमार व्यक्तियों की संख्या में दोगुनी वृद्धि हुई है। जिसे अगर समय पर नहीं रोका गया तो भविष्य में भयानक दुष्परिणाम से बच पाना असम्भव हो जाएगा।

ऐसे समय में जब हम अपने तक ही सीमित होकर रह जाते हैं तो समाज, संस्कृति तथा पर्यावरण को बचाने की सोच तक तो पहुंच ही नहीं पाते हैं। सतही तौर पर तो सभी साफ-सुथरा तथा अच्छा लगता है पर गहराई में जाने पर अन्दर से खालीपन ही दिख पड़ता है। अन्दर से मजबूत परिवार किसी भी परेशानी का सामना आसानी से कर लेते हैं और किसी भी झंझावात से बाहर निकल आते हैं और वह भी ज्यादा दृढ़ इरादों व नये अनुभव और उत्साह के साथ।

इसलिए जीवन में साथ रहना ही नहीं एक दूसरे को समझना भी बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। केवल अधिक पैसा या केवल प्यार जताने से ही गृहस्थी नहीं चलती है। इसके लिए मार्मिकता, प्रेममय भाव व समर्पण भी चाहिए जिसका अभाव शहरी जीवन में बढ़ता ही जा रहा है। जब सभी परिवार के सदस्य एक दूसरे को समय न दे पाएंगे तो एक दूसरे को समझेंगे कैसे? बच्चों व बड़ों को अगर उचित समय व सम्मान नहीं दिया जाता है तो वो आपकी बातों को सम्मान नहीं देते हैं और आपकी बातों से कटने लगते हैं और फिर धीरे-धीरे दूरियां बढ़ने लगती हैं। हमें (पति-पत्नी) एक दूसरे को समझना होगा जिसके लिए समय की आवश्यकता होती है। छोटी-छोटी समस्याओं का हल तो बातचीत से ही निकल जाता है और बहुत सी परेशानियां तो केवल गलतफहमी या संवादहीनता की वजह से ही हो जाया करती हैं।

आजकल प्रेम दिखाने का मतलब उपहार (गिफ्ट) या पार्टी तक ही सीमित रह गया है जबकि प्यार में समर्पण भी है और त्याग भी और वह भी निस्वार्थ भाव से। मेरी समझ में अपने बाह्य कार्य एवं गृह कार्य को अगर संतुलित तरीके से किया जाए तथा साथ ही साथ परिवार को उचित समय, सम्मान व वरिष्ठ लोगों से मिले सुझाव व संस्कार को आगे बढ़ाया जाए तो हम इन परेशानियों से भी बच सकते हैं व साथ ही साथ अपने आलौकिक व सांस्कृतिक विरासत को भी आगे बढ़ा पाऐंगे। कोरोना काल ने हमें परेशानियां तो दी हैं पर इससे हमे सीख मिलती है कि सुखमय जीवन जीने के लिए हमें बहुत ज्यादा पैसों या साजो-सम्मान की जरूरत नहीं होती है। कम बजट के बिना ज्यादा बाहर घूमे या बिना रेस्तरां का खाना खाएं भी जीवन सुखमय होता है। बस जरूरत है तो संतुलित सोच की। एक और बड़ी आश्यर्च की बात देखने को मिलती है कि इस महा-बंद के दौरान हमने अपने बच्चों को बड़ा होते हुए देखा है, वरना ये सुख जिंदगी की आपाधापी में कहीं खो सा गया था।

पुराणों में बहुत ही स्पष्ट रूप से लिखा है कि भारत भूमि में जन्म लेना कई जन्मों के पुण्यों का फल है। ऐसा शायद इसलिए है कि हमने हमेशा से हमारे भौतिक सुखों की अपेक्षा परोपकार, नैतिक मूल्यों, संस्कृति, दान, त्याग तथा पर्यावरण को ज्यादा महत्त्व दिया है। हम उस पैसे का क्या करेंगे जब हम अपने परिवार की सुख-शांति समाज, पर्यावरण व संस्कृति को भी सहेज के न रख पाएगा जो कि हमें विरासत में मिले हैं। प्रत्येक सुख-दुख में जीना व एक-दूसरे की सहायता करना हमारे रक्त में निहित है और यही कारण है कि हमारे त्यौहार हमें सतरंगी रंगों में रंग कर पूरे जीवन को हर्षोल्लास व उत्साह से भर देते है। मेरी समझ में अगर हम अपने पुरखों की इस उत्तम व मानवीय विरासत को आगे बढ़ा पाएगा तो शायद हम उनके ऋण से कुछ हद तक उऋण हो सकेंगे।

(लेखन डॉ. भुवन पाण्डेय एनेस्थिसिया यानी सर्जरी के वक्त बेहोशी की दवा देने वाले विशेषज्ञ चिकित्सक हैं। इन दिनों नई दिल्ली के सर गंगाराम हॉस्पिटल के एनीस्थिसिया विभाग में कंसल्टेंट हैं।)

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