प्रौद्योगिकी के विकास के साथ बढ़ती महामारी का सीधा रिश्ता

प्रौद्योगिकी के विकास

डॉ. प्रभात कुमार चौधरी/डॉ. भुवन चंद्र पाण्डेय:

प्रौद्योगिकी मानव समाज का सबसे बड़ा वरदान है। इसने मानव सभ्यता को गढ़ने और आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। प्रौद्योगिकी ने हमारे परिवेश को संवारने और उसे अपने हित में उपयोग करने की क्षमता प्रदान की है। प्रोद्योगिकी का निरंतर विकास आधुनिक मानव की उच्च मानसिक क्षमता का ही विस्तार है। लेकिन इसका दूसरा पहलू जो हमारी आंखों से ओझल रहा है या शायद आदतन जिसे हम देखना नहीं चाहते हैं, वह है- इसके गर्भ में निहित विनाश की क्षमता। प्रौद्योगिकी और महामारी का रिश्ता इसका श्रेष्ठ उदाहरण है।

प्रौद्योगिकी के आगमन से आधुनिक युग में मनुष्यों को औजार, व्यापार, यात्रा का वरदान मिला। लेकिन अपने साथ ये महामारियों की बाढ़ भी लाई। विकास के साथ वैज्ञानिक खोजों ने सिद्ध किया कि महामारियों का कारण बैक्टीरिया, वायरस या अन्य सूक्ष्म जीव हैं। अब ये प्रमाणित हो चुका है कि प्रौद्योगिकी के विकास से न सिर्फ महामारी पैदा होती है, वरन इसके उत्कर्ष की हर छलांग के साथ महामारी और विनाशकारी होती जाती है।

आधुनिक मनुष्य का प्रौद्योगिकी से पहला परिचय खेती के लिए उपकरणों के साथ हुआ। इसके साथ फसल जनित श्वांस रोगों की भी शुरूआत हुई। खेती के बाद पशुपालन का दौर आया। पशुओं के पालन-पोषण से मनुष्य का परिचय पशुओं से होने वाली बीमारियों से हुआ। तपेदिक, कुष्ठ रोग, चेचक, रैजीब जैसी बीमारियों पशुपालन से मिली। अगर हम इतिहास के पन्ने पलटे तो पाएंगे कि बीमारियां धीरे-धीरे घातक होती गई। एचआईवी और इन्फ्लुएंजा जैसे रोग मानव जाति के अस्तित्व के लिए ही खतरा बन गए।

विकास के क्रम में मनुष्य की अगली बड़ी छलांग थी यात्रा की महारत। ये पहिए के आविष्कार से संभव हुआ। यात्रा व्यापार, तीर्थ, युद्ध, अध्ययन और आनंद के लिए किया जाता रहा। लोगों की आवाजाही से चार चीजें इधर-उधर जाती हैं- वस्तु, व्यक्ति, पूंजी एवं विचार। लेकिन पांचवीं चीज जो यात्रा के साथ चलती है वो है महामारी। यह विश्वास करना भी कठिन है कि यात्रा से महामारी फैल सकती है। लेकिन ऐतिहासिक विवरण और वर्तमान परिदृश्य ने इसे प्रत्यक्ष रूप से प्रमाणित किया है।

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चौदहवीं शताब्दी की सबसे बड़ी महामारी:-

चौदहवीं शताब्दी की सबसे बड़ी महामारी प्लेग जिसे ब्लैक डेथ के नाम से जाना जाता है, गोबी रेगिस्तान में सदियों से निष्क्रिय पड़े एक कीटाणु की वजह से शुरू हुआ। यह कीटाणु रेशम मार्ग से व्यापारियों के ऊंटों पर सवार होकर यूरोपीय व्यापारियों के जहाजों के साथ यूरोप में प्रवेश कर गया। ढाई सौ वर्षों से भी अधिक तक यात्रियों के आवागमन के साथ ये कई-कई बार मनुष्यता का अंत करने लौट कर आया। ऐसे ही 1817 तक हैजा भारतीय प्रायद्वीप में बंगाल प्रांत की एक स्थानीय बीमारी थी। तीर्थयात्रियों, व्यापारियों और सैनिकों के माध्यम ये महामारी बनकर पूरे एशिया, यूरोप, उत्तर अमेरिका और दक्षिण अमेरिका तक फैला। 1889-90 के कालखंड में रूस में पैदा हुई एशियाई फ्लू, रेलवे लाइनों और जहाज मार्गों के साथ पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में फैला।

19वीं शताब्दी की सबसे बड़ी महामारी:-

19वीं सदी में इंफ्लुएंजा फ्लू और अन्य महामारियों की शुरुआत 1918 के स्पेनिश फ्लू महामारी से हुई। इसकी उत्पत्ति प्रथम विश्व युद्ध के दौरान दक्षिणी फ्रांस में हुई। वहां से मित्र देशों के लौटते हुए सैनिकों के जरिए ये पूरे विश्व में फैल गया। इसके बाद तो महामारियों का सैलाब फूट पड़ा। 1957-59 का एशिया फ्लू, 1968-69 का हांगकांग फ्लू, 1997 का बर्ड फ्लू, 2003 का एवियन इंफ्लुएंजा, 2009 का स्वाइन फ्लू, 2015 का जीका, 2017 का निपा। इन्हीं बीमारियों की सूची में नवीनतम प्रविष्टि कोविड-19 की। इससे अब तक लाखों लोग काल के गाल में समा चुके हैं।

कोविड-19 की शुरुआत:-

ऐसा हमारी लंबी दूरी की यात्रा की बढ़ती क्षमता और आसक्त प्रवृति के कारण हुआ। कोविड-19 की शुरुआत चीन के अंदरूनी भागों में हुई। लेकिन व्यस्त और गहन व्यापारिक गतिविधियों तथा अत्यधिक पर्यटकों की आवाजाही के साथ यह सारी दुनिया में फैल गया। आज हमारे पास लंबी दूरियों को तय करने वाले तकनीक रूप से उन्नत परिवहन के साधन नहीं होते या इनका अनियंत्रित उपयोग नहीं होता तो शायद कोविद महामारी से इतने बड़े अनुपात की आपदा नहीं हुई होती।

हम समझते हैं कि परिवहन ने महामारी जैसी प्राकृतिक आपदाओं के खिलाफ लड़ाई में रसद, दवाओं और मशीनरी पहुंचाने मदद की है। लेकिन विचारणीय प्रश्न है कि क्या इसने एक स्थानीय संक्रमण को वैश्विक महामारी नहीं बना दिया। हम हमेशा सोचते रहे कि प्रौद्योगिकी का प्रभाव केवल ग्लोबल वार्मिंग और जीवनशैली से जुड़ी गैर संक्रामक बीमारियों और मानसिक बीमारियों तक ही सीमित है। पर वास्तव में प्रौद्योगिकी ने महामारी को स्थानीय समस्या से वैश्विक समस्या बनाने का काम किया है।

कुछ लोगों का तो मत यह भी है कि वर्तमान कोविद संकट हमारी विदेशागत भोजन की लालसा का परिणाम है। हालांकि अभी ये सिद्ध नहीं हुआ है। लेकिन हमारा लोभ इसे भी वास्तविकता बना सकता है। एक दिन जब हम इस कोविद संकट से बाहर निकल आएंगे और वापस मुड़ कर देखेंगे, तब महसूस करेंगे कि अत्यधिक तकनीकी विकास हमेशा से ही महामारी का कारण रहा है। इसने हजारों-लाखों सालों से शांत पड़े रोगजनक सूक्ष्मजीवों को रक्तबीज की तरह अधिक सशक्त बनाया और व्यापक रूप से फैलाया। इन सभी महामारियों का प्रभाव इतना व्यापक था कि इसने पूरी आबादी या कई बार पूरी सभ्यता को ही लुप्तप्राय कर दिया। यह तथ्य हमेशा से ही हमारे सामने स्पष्ट था। लेकिन इसे देखने में हम एक बार नहीं, कई बार चूके। हालांकि समय ने भी बारंबार महामारी की ठोकर से हमें कुंभकरणी निद्रा से जगाकर दिखाने की कोशिश की। लेकिन हम अपने दम्भ में ही प्रफुल्लित रहें और हर बार इससे अपना मुंह फेर लिया।

हमारे मनीषियों ने पुराणों में भी इसका उल्लेख किया है। वेदों में लिखा है कि आकाश पिता तुल्य, पृथ्वी माता के समान और समस्त अंतरिक्ष पुत्र के समान है। तीनों ही सामंजस्य बनाकर रहते हैं। अत्यधिक दोहन करने से पृथ्वी असंतुलित हो जाती है। इसका तारतम्य बिगड़ जाता है और अंत में प्रलय का कारण बनता है। साहित्यकारों ने भी इस सर्वज्ञात तथ्य को समय-समय पर अपनी लेखनी से लयबद्ध किया है। हिंदी की हमारे महान कवि दिनकर ने कहा था

अगर समय रहते हम सचेत न हुए तो डर इस बात का है कि कहीं उस स्थिति पर न पहुंच जाए जहां से वापसी की संभावना ही ना हो। तब हम चाह कर भी कुछ ना कर पाएंगे और विनाश अवश्यंभावी हो जाएगा। अब समय आ गया है, उस एकमात्र सवाल पर गहन मंथन करने का, क्या हम प्रौद्योगिकी विज्ञान की सहायता से प्रगति विकास का सही रास्ता अपनाएंगे। प्रकृति के साधनों का उतना ही उपयोग करेंगे जितनी आवश्यकता है। जैसा कि हमारे पुरखे हजारों सालों से करते आए हैं। कई प्रथाएं हमारे ग्रामीण अंचल के लोगों ने आज भी संजो कर रखी हुई है कि पेड़ काटोगे तो पाप लगेगा, हरे पत्ते मत तोड़ो, खाना बर्बाद नहीं करना चाहिए। ये बातें आज भी हमारे प्रतिदिन की नैतिकता का हिस्सा है।

अगर हम ना रुके और विकास की एक अंधी और कभी न खत्म होने वाली होड़ में शामिल हो जाएंगे तो विनाश के सिवाय कुछ भी हाथ नहीं लगेगा। यह परिदृश्य एक दोराहे के समान है। हम सभी को अपना रास्ता चुनने का अधिकार है। एक रास्ता प्रकृति के साथ सामंजस्य में रहने और दूसरा अत्यधिक विकास के द्वारा नाश का है। पुरानी कहावत है कि अति सर्वत्र वर्जयेत। प्रकृति के साथ अगर हम सामंजस्य में रहे तो आने वाली पीढ़ियों को प्रकृति का अनुपम उपहार व इस धरा को सर्वांगीण सौंदर्य से सुशोभित कर पाएंगे। अन्यथा सभी जानते हैं कि विनाश ही हमारी एकमात्र परिणीति है। क्योंकि हम सभी में उस परम ब्रह्म का अंश है। सभी यथा योग्य बुद्धि रखते हैं। इसलिए अपने-अपने मार्ग के चयन का फैसला खुद आपको करना है।

लेखकद्वय - डॉ. प्रभात कुमार चौधरी और डॉ. भुवन चंद्र पाण्डेय नई दिल्ली के मशहूर सर गंगाराम हॉस्पिटल में एनेस्थिशिया विभाग में सीनियर कंसल्टेंट हैं।

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