संकट में धरती का भगवान - कोरोना की इस त्रासदी के समय

संकट में धरती का भगवान - कोरोना Yoga
Corona Time Yoga

कोरोना की इस त्रासदी के समय जब विश्व में त्राहि- त्राहि मची है, ऐसे वक्त में भी डॉक्टर ने अपने कर्तव्य से मुंह नहीं मोड़ा है, चाहे गांव हो या शहर, सुविधाएं कम हो या पर्याप्त, सामान भी उपलब्ध हो या ना हो, किसी डॉक्टर या चिकित्सा कर्मी ने ड्यूटी से ना नहीं कहा है। लेकिन कुछ रोगियों के परिजनों की हरकतों से धरती का ये भगवान भी संकट में हैं।

डॉ. भुवन चंद्र पाण्डेय:

जब मनुष्य जीवन के भयावह झंझावातों से उदिग्न हो जाता है और सारे मार्ग बंद दिखाई देने लगते हैं, तब ईश्वर ही उसकी एकमात्र उम्मीद रह जाता है। ऐसे ही किसी गंभीर बीमारी या संकट काल में आदमी डॉक्टर के पास भागता है। ऐसे वक्त में डॉक्टर उनकी आशा की एकमात्र किरण होते हैं। मरणासन्न व्यक्ति का इलाज के बाद मृत्युशय्या से उठ जाना वाकई चमत्कार से कम नहीं है। इसलिए डॉक्टर को ईश्वर का दूसरा रूप भी कहा जाता है। पर ये चमत्कार ऐसे ही नहीं हो जाता है। एक डॉक्टर को परिपक्व होने में वर्षों की कठिन मेहनत और एक दशक से ज्यादा की पढ़ाई लगती है। सही मायने में ये तपस्या ही है। यही वजह है कि समाज डॉक्टर में भगवान की छवि देखता है।

लेकिन हम भगवान नहीं, इंसान ही हैं और हमारी भी कुछ सीमाएं हैं। इसलिये कई बार लाख कोशिशों के बावजूद मरीज के प्राण नहीं बच पाते हैं। दिन-रात और महीनों की मेहनत पल भर में छिन्न भिन्न हो जाती है। मरीज के प्राण छोड़ते ही एक असामान्य परिवर्तन उनके परिजनों पर भी आ जाता है। जो लोग अभी तक डॉक्टर में अगाध विश्वास कर रहे थे। अब अप्रमाणिक आरोपों के साथ उसे कठघरे में खड़ा कर देते हैं। यही लोग अभद्र आचरण, मारपीट, तोड़फोड़ से भी नहीं चूकते। कोरोना के इस परेशानी से भरे समय में आपको ऐसे समाचार खूब सुनने को मिल रहे हैं, जहां हर मरीज की मौत का जिम्मेदार डॉक्टर को ठहरा दिया जाता है।

और पढ़े:

क्या आपको लगता है कि ऐसा करना उचित है?

कोरोना की इस त्रासदी के समय जब विश्व में त्राहि- त्राहि मची है, ऐसे वक्त में भी डॉक्टर ने अपने कर्तव्य से मुंह नहीं मोड़ा है, चाहे गांव हो या शहर, सुविधाएं कम हो या पर्याप्त, सामान भी उपलब्ध हो या ना हो, किसी डॉक्टर या चिकित्सा कर्मी ने ड्यूटी से ना नहीं कहा है। सभी लोगो को यह अहसास होना चाहिए कि पीपीई किट पहनकर ड्यूटी करना आसान काम नहीं है। इसे पहनने से गर्मी और पसीने की वजह से घुटन होती है। कुछ बोलना और सुनना भी बहुत मुश्किल होता है और एक बात को सुनने या समझने के लिए कई बार बोलना पड़ता है। कई बार तो चिल्लाना भी पड़ जाता है।

सिर्फ डॉक्टर ही नहीं बल्कि नर्स, वार्डबॉय, सफाई कर्मचारी और अन्य स्वास्थ्य कर्मी अपने जीवन को दांव पर लगाकर काम करते हैं। दिन-रात ऐसा माहौल में काम करने से शारीरिक थकान तो होती ही है। साथ ही मानसिक संतुलन बिगड़ने की संभावना बनी रहती है।

कोरोना मरीजों के वार्ड में काम करने से खुद उनके और उनके परिवार के संक्रमित होने का खतरा बना रहता है। ना जाने कितने ही स्वास्थ्य कर्मियों को कोरोना संक्रमण हो चुका है व बहुत से स्वास्थ्य कर्मी प्राणों की आहुति दे चुके हैं। लेकिन आज तक किसी स्वास्थ्य कर्मी ने इसका इल्जाम किसी मरीज पर या उसके परिजनों पर नहीं लगाया है।

असल में हम सभी का लक्ष्य एक ही है, ज्यादा से ज्यादा लोगों की जान बचाना । और यह संघर्ष केवल चिकित्सालय में ही नहीं, बल्कि हर समय रहता है, लगातार बज रहे फोन और स्वास्थ्य संबंधी कई प्रश्नों और संदेशों को लेकर लगातार यथायोग्य परामर्श देना भी एक चुनौती से कम नहीं है। कोरोना से गंभीर रूप से संक्रमित लोगों को ठीक होने में समय लगता है और कई लोग तो बच भी नहीं पाते हैं। हॉस्पिटल में बहुत से लोग मरणासन्न स्थिति में आते हैं और कुछ लोग तो हॉस्पिटल पहुचने से पहले ही प्राण छोड़ देते हैं। जो मरीज पहले से किसी बीमारी से ग्रसित हैं उनके और गंभीर बनने की संभावना ज्यादा होती है। ऐसे में हर बार डॉक्टर से मारपीट करना कहां तक उचित है।

मैंने इन शब्दों में चिकित्सक की मनोदशा व व्यथा को लिखने का प्रयास किया है। यकीन मानिए कि अगर समाज, चिकित्सक वर्ग को उचित सम्मान देने के साथ – साथ उनमें विश्वास रखता है तो वह अपनी 100 गुना शक्ति से काम करता है। मैं आशा करता हूं कि सभी लोग इस बात को समझेंगे और भारतीय संस्कृ्ित द्वारा प्रदत्त उच्चतम मानवीय मूल्यों को पुनः स्थापित करेंगे। ताकि ये डॉक्टर- मरीज का यह रिश्ता, उपयोगी और विश्वसनीय बन जाए और समाज सेवा के पुण्य कार्य में अपना अतुलनीय योगदान दें।

(लेखक डॉ. भुवन पाण्डेय एनेस्थिसिया के विशेषज्ञ चिकित्सक हैं। इन दिनों नई दिल्ली के सर गंगाराम हॉस्पिटल के एनीस्थिसिया विभाग में कंसल्टेंट हैं।)

और पढ़े:

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post